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अब ना मैं हूँ, ना बाकी हैं ज़माने मेरे​

अब ना मैं हूँ, ना बाकी हैं ज़माने मेरे​,
फिर भी मशहूर हैं शहरों में फ़साने मेरे​,
ज़िन्दगी है तो नए ज़ख्म भी लग जाएंगे​,
अब भी बाकी हैं कई दोस्त पुराने मेरे।

लू भी चलती थी तो बादे-शबा कहते थे,
पांव फैलाये अंधेरो को दिया कहते थे,
उनका अंजाम तुझे याद नही है शायद,
और भी लोग थे जो खुद को खुदा कहते थे।

हाथ ख़ाली हैं तेरे शहर से जाते जाते,
जान होती तो मेरी जान लुटाते जाते,
अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है,
उम्र गुज़री है तेरे शहर में आते जाते।

चेहरों के लिए आईने कुर्बान किये हैं,
इस शौक में अपने बड़े नुकसान किये हैं,​
महफ़िल में मुझे गालियाँ देकर है बहुत खुश​,
जिस शख्स पर मैंने बड़े एहसान किये है।

​तेरी हर बात ​मोहब्बत में गँवारा करके​,
​दिल के बाज़ार में बैठे हैं खसारा करके​,
​मैं वो दरिया हूँ कि हर बूंद भंवर है जिसकी​,​​
​तुमने अच्छा ही किया मुझसे किनारा करके।

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो,
ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो,
एक ही नदी के हैं ये दो किनारे दोस्तो,
दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो।

अजीब लोग हैं मेरी तलाश में मुझको,
वहाँ पर ढूंढ रहे हैं जहाँ नहीं हूँ मैं,
मैं आईनों से तो मायूस लौट आया था,
मगर किसी ने बताया बहुत हसीं हूँ मैं।

अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ,
ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ,
फूँक डालूँगा किसी रोज़ मैं दिल की दुनिया,
ये तेरा ख़त तो नहीं है कि जला भी न सकूँ।

रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है,
चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है,
रोज़ पत्थर की हिमायत में ग़ज़ल लिखते हैं,
रोज़ शीशों से कोई काम निकल पड़ता है।

उसे अब के वफ़ाओं से गुजर जाने की जल्दी थी,
मगर इस बार मुझ को अपने घर जाने की जल्दी थी,
मैं आखिर कौन सा मौसम तुम्हारे नाम कर देता,
यहाँ हर एक मौसम को गुजर जाने की जल्दी थी।

हाथ खाली हैं तेरे शहर से जाते-जाते,
जान होती तो मेरी जान लुटाते जाते,
अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है,
उम्र गुजरी है तेरे शहर में आते जाते।

मैंने अपनी खुश्क आँखों से लहू छलका दिया,
इक समंदर कह रहा था मुझको पानी चाहिए।

बहुत गुरूर है दरिया को अपने होने पर,
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ।

आते जाते हैं कई रंग मेरे चेहरे पर,
लोग लेते हैं मजा ज़िक्र तुम्हारा कर के।

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हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी, के हर ख़्वाहिश पे दम निकले

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी, के हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन बहुत बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले मुहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का मुहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का उसी को देखकर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी, के हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले. ख़ुदा के वास्ते पर्दा न काबे इसे उठा ज़ालिम ख़ुदा के वास्ते पर्दा न काबे इसे उठा ज़ालिम कहीं ऐसा ना हो याँ भी वही काफ़िर सनम निकले

इंसाफ़

मुन्सिफ़ हो अगर तुम तो कब इंसाफ़ करोगे मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँ नहीं देते -अहमद फ़राज़ इंसाफ़ की तराज़ू में तौला अयाँ हुआ यूसुफ़ से तेरे हुस्न का पल्ला गिराँ हुआ -हैदर अली आतिश आसाँ नहीं इंसाफ़ की ज़ंजीर हिलाना दुनिया को जहाँगीर का दरबार न समझो -अख़तर बस्तवी अंजाम को पहुँचूँगा मैं अंजाम से पहले ख़ुद मेरी कहानी भी सुनाएगा कोई और - आनिस मुईन आना है तो आ राह में कुछ फेर नहीं है भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है -साहिर लुधियानवी इंसाफ़ के पर्दे में ये क्या ज़ुल्म है यारों देते हो सज़ा और ख़ता और ही कुछ है -अख़तर मुस्लिमी तुम्हारे शहर का इंसाफ़ है अजब इंसाफ़ इधर निगाह उधर ज़िंदगी बदलती है - महबूब ख़िज़ां ऐ देखने वालो तुम्ही इंसाफ़ से कहना चाँदी की अँगूठी भी है कुछ गहनों में गहना - इस्माइल मेरठी ज़ुल्म भूले रागनी इंसाफ़ की गाने लगे लग गई है आग क्या घर में कि चिल्लाने लगे - जोश मलीहाबादी मोहतसिब सच सच बता ख़ल्वत में क्या सौदा हुआ मुद्दई इंसाफ़ से महरूम कैसे हो गया - क़ासिम जलाल मुंसिफ़ को मस्लहत की ज़बाँ रास आ गई गो फ़ैसल...

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