मुन्सिफ़ हो अगर तुम तो कब इंसाफ़ करोगे
मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँ नहीं देते
-अहमद फ़राज़
इंसाफ़ की तराज़ू में तौला अयाँ हुआ
यूसुफ़ से तेरे हुस्न का पल्ला गिराँ हुआ
-हैदर अली आतिश
आसाँ नहीं इंसाफ़ की ज़ंजीर हिलाना
दुनिया को जहाँगीर का दरबार न समझो
-अख़तर बस्तवी
मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँ नहीं देते
-अहमद फ़राज़
इंसाफ़ की तराज़ू में तौला अयाँ हुआ
यूसुफ़ से तेरे हुस्न का पल्ला गिराँ हुआ
-हैदर अली आतिश
आसाँ नहीं इंसाफ़ की ज़ंजीर हिलाना
दुनिया को जहाँगीर का दरबार न समझो
-अख़तर बस्तवी
अंजाम को पहुँचूँगा मैं अंजाम से पहले
ख़ुद मेरी कहानी भी सुनाएगा कोई और
- आनिस मुईन
आना है तो आ राह में कुछ फेर नहीं है
भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है
-साहिर लुधियानवी
इंसाफ़ के पर्दे में ये क्या ज़ुल्म है यारों
देते हो सज़ा और ख़ता और ही कुछ है
-अख़तर मुस्लिमी
ख़ुद मेरी कहानी भी सुनाएगा कोई और
- आनिस मुईन
आना है तो आ राह में कुछ फेर नहीं है
भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है
-साहिर लुधियानवी
इंसाफ़ के पर्दे में ये क्या ज़ुल्म है यारों
देते हो सज़ा और ख़ता और ही कुछ है
-अख़तर मुस्लिमी
तुम्हारे शहर का इंसाफ़ है अजब इंसाफ़
इधर निगाह उधर ज़िंदगी बदलती है
- महबूब ख़िज़ां
ऐ देखने वालो तुम्ही इंसाफ़ से कहना
चाँदी की अँगूठी भी है कुछ गहनों में गहना
- इस्माइल मेरठी
ज़ुल्म भूले रागनी इंसाफ़ की गाने लगे
लग गई है आग क्या घर में कि चिल्लाने लगे
- जोश मलीहाबादी
इधर निगाह उधर ज़िंदगी बदलती है
- महबूब ख़िज़ां
ऐ देखने वालो तुम्ही इंसाफ़ से कहना
चाँदी की अँगूठी भी है कुछ गहनों में गहना
- इस्माइल मेरठी
ज़ुल्म भूले रागनी इंसाफ़ की गाने लगे
लग गई है आग क्या घर में कि चिल्लाने लगे
- जोश मलीहाबादी
मोहतसिब सच सच बता ख़ल्वत में क्या सौदा हुआ
मुद्दई इंसाफ़ से महरूम कैसे हो गया
- क़ासिम जलाल
मुंसिफ़ को मस्लहत की ज़बाँ रास आ गई
गो फ़ैसला हुआ मगर इंसाफ़ कब हुआ
- लैस क़ुरैशी
मुद्दई इंसाफ़ से महरूम कैसे हो गया
- क़ासिम जलाल
मुंसिफ़ को मस्लहत की ज़बाँ रास आ गई
गो फ़ैसला हुआ मगर इंसाफ़ कब हुआ
- लैस क़ुरैशी
प्यारे ख़ुदा के वास्ते टुक अपने दिल के बीच
इंसाफ़ तो करो ये किसे मार कर चले
- मोहम्मद रफ़ी सौदा
अब उस के सामने इंसाफ़ का तराज़ू है
उन्हें कहें कि अदालत का एहतिराम करें
- रुख़्सार नाज़िमाबादी
इंसाफ़ तो करो ये किसे मार कर चले
- मोहम्मद रफ़ी सौदा
अब उस के सामने इंसाफ़ का तराज़ू है
उन्हें कहें कि अदालत का एहतिराम करें
- रुख़्सार नाज़िमाबादी
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